Friday, 11 September 2026

बाल साहित्य और बाल संस्कार

  बाल साहित्य और बाल संस्कार 

किसी भी देश की वास्तविक सम्पत्ति उसके संस्कारयुक्त बालक होते हैं | अतः बच्चों की उचित शिक्षा दीक्षा और सलीके से किया गया उनका पालन पोषण ही एक सुद्र्ण राष्ट्र के निर्माण का आधार है | बाल कल्याण और बाल संस्कारों की नींव वस्तुतः उत्कृस्ट कोटि का बाल साहित्य ही है | आज विद्यालयों में हावी उपभोक्तावादी संस्कृति के चलते तरह तरह की शिक्षाएं दी जा रहीं है ,किन्तु वह ज्ञान जो बच्चों को स्वतंत्र और उपयोगी नागरिक बनाता है ,क्या उन्हें वास्तविक अर्थों में प्राप्त हो रहा है ? बच्चों के बस्तों का बोझ आप और हम सभी देख रहे हैं | एक सात वर्ष के बच्चे के बस्ते में कम्प्यूटर तथा आधुनिक विज्ञानं की अंग्रेजी में किताबें देखकर हम चौकतें नहीं ,बल्कि खुश होते हैं | पर क्या हमने कभी सोचा है कि बच्चा इन्हे समझने में कितना समर्थ है यह वः अवस्था है जब बच्चे को कम्प्यूटर और विज्ञान की अपेक्षा नैतिकता की शिक्षा की ज्यादा जरूरत है   बच्चे सब कुछ जानने के बाबजूद यह नहीं जानते हैं हैं की उन्हें अपने घर परिवार ,पड़ोस ,संबंधियों और  साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए | हम अपनी व्यस्तताओं समाज  अलग दिखने में अंधी दौड़ के चलते बच्चों  स्वस्थ संस्कार देने के प्रति उदासीन बने रहतेहैं  साथ ही अच्छा साहित्य उपलब्ध कराने के लिए कोई प्रयास नहीं करते हैं | 

आज वे ही बच्चे अच्छे समझे जाते हैं जो किसी आगंतुक के आने पर एकांत में जाकर पढ़ने लगे या फिर अलग कमरे में टी.वी. देखने लगे मोबाईल या कम्प्यूटर पर गूगल में व्यस्त दिखें वे क्या देख रहे हैं उसकी तरफ कोई ध्यान नहीं पिछले दिनों करीब १० वर्षों के बाद मेरा एक परिचित के यहाँ जाना हुआ उनके बच्चे और हमारे बच्चे बराबर के थे फिर भी उनके बच्चे सामनेसमने नहीं आये आदर सत्कार खूब किया लेकिन ये उपेक्षा हम लोगों को नागवार गुजरी ,अब बच्चे १४ साल के थे उस दिन के बाद हम सबके मन से वे उतर गए क्योकि यह व्यवहार बच्चों को भी अच्छा नहीं लगा क्यूंकि अब वे समझदार हो गए थे कालोनी में ही एक सप्ताह तक हम लोग रुके रहे इस बीच वे दम्पति तो मिलने बार बार आये लेकिन अपने बच्चों से नहीं मिलवाया | और जब भी उनसे बच्चों के बारे में पूछा तो उनका एक ही जबाब रहता की बच्चे पढ़ रहे हैं और वे कहीं आना जाना नहीं पसंद करते हैं वे बड़े ही गरब से ये बात कहते की उनके बच्चों की दुनिया पढ़ाई लिखे और गूगल तक ही सिमटी हुई है आज हजारों की संख्या में बाल साहित्य की श्रेष्ठ पुस्तके प्रकाशित हो रहीं हैं ,और बाल पत्रिकाओं की संख्या भी कम नहीं हैयह साहित्य ज्ञान और मनोरंजन उन्हें दिशा निर्देश भी देगा सबसे बड़ी बात तो यह है की अच्छे साहिबच्चों की दुनिया कमरों तक सिमित कर देने में दूरदर्शन ,मोबाईल और अब तो गूगल का भी बड़ा हाथ है अधिक से अधिक चैनलों की सुविधा और बच्चों के हाथों में उसका रिमोट कंट्रोल देने में हम बड़ों का भी हाथ है जबकि इन सबके साथ अच्छी पुस्तकों का होना भी बहुत जरूरी है अच्छे साहित्य के प्रति बच्चों में रूचि जाग्रत करना हम माता पिता का ही दायित्व है वे प्रारम्भ से ही बच्चों को समाचार पत्र पढ़ने को प्रेरित करें उन्हें अच्छा साहित्य उपलब्ध करावें टीवी मोबाईल में अच्छे अच्छे प्रोग्राम देखें वे क्या देख रहे हैं उस पर ध्यान दें ,आप खेल खेल में उससे पूछते रहें की उन्हें क्या पसंद है साथ बैठकर देखने का प्रयास करें अब तो आस्क जेमिनी और चैट जी पिटी जैसे बहुत से ऍप आ गए हैं जित्य के माध्यम से बच्चों को भाषा का संस्कार मिलता है कई विद्वानों ने पुस्तकों को सबसे अच्छे मित्र की संज्ञा दी है 

समाज में तेजी से बढ़ रहा हिंसाचार ,फिल्मो में विभत्स्ता ,कल्पनाओं में उड़ना अख़बारों में छाई हिंसा की खबरें बच्चों के कोमल मन को किस तरह प्रभवित करती हैं इसकी कल्पना करना ही दुरूह है इससे मुक्ति पाने के सरे रस्ते अब बंद से नजर आने लगे हैं यही नहीं विज्ञापन के जरिये अनावस्यक वस्तुओं को आकर्षित ढंग से पर्दर्सित करके बच्चों में हिन् भावना पैदा की जा रही है यह किसी जहर से कम घातक नहीं हैबच्चों को इस कुचक्र से कैसे निकला जाये ,यह हर माता पिता के लिए अहम सवाल है इसके लिए माता पिता को अधिक से अधिक समय देकर बच्चों को उसकी उपयोगिता और अनुपयोगिता के बारे में धैर्य से समझना और समझाना होगा | 

बच्चों को संस्कारित करके एक सुयोग्य नागरिक बनाना हर माता पिता की नैतिक जिम्मेदारी है जिससे उसमे अतीत प्रति गर्व हो ,वर्तमान का ज्ञान हो और भविष्य के प्रति आस्था उतपन्न हो। सो अच्छे मित्र की भांति उनका मार्गदर्शन करें ,उनमे कल्पना शक्ति विकसित करें तथा मानवीय एवं उपकार की भावनाएं जाग्रत करें ,साथ ही विषम परिस्थितयों में सही निर्णय लेने की क्षमताएं पैदा करें |  

Sunday, 12 July 2026

आज का दिन

आज कम्प्यूटर लग गया अच्छा लगा अब धीरे धीरे याद आने लगा 

Sunday, 15 February 2026

Svymbhu मनु.शतरूपा से सृष्टि की शुरुआत हुई.

 इनकी तीन कन्याएं हुई प्रसूति देवहुति और आहुति 

देव मतलब जिसने भगवान को बुलाया हो वह देव और मन की देखे वो देवता 

जो नर इशारे से बुलाए वो इंसान और जो कहे से  भी न करे वो नर पशु समान 

देवहुति की शादी krdabh ऋषि से हुईं एक बार krdabh ऋषि तपस्या मैं लीन थे. ओम नमो bhgvte वासुदेव. ये द्वादश अक्षर का प्रधान मंत्र है इधर नारदजी ने ऋषि को बता दिया था कि मनु और शतरूपा अपनी देवहुति का विवाह आप से करेंगे.. ऋषि सोच रहे कि ये राजकुल की कन्या कैसे रहेगी तो ऋषि ने मनु शतरूपा को बहुत समझाया लेकिन वे नहीं माने और देवहुति का विवाह ऋषि से कर के वापस ब्रम्हा वृत्त  चले गए. इधर देवहुति पति का सारा काम मन से समझ कर कर लेती थी अब ऋषि ने देवहुति की परीक्षा लेने के लिये 100 वर्षों तक के लिए समाधि लगा ली. किन्तु जब वे जागे तो तो उन्होंने देवहुति को अपने काम में पहले की तरह ही तल्लीन पाया और भेष बदल कर बोले देवी तुम कौन हो तब देवहुति ने अपना परिचय दिया. ऋषि प्रसन्न होकर बोले हम तुमसे प्रसन्न हुए कोई वरदान मांगों तब देवहुति नें वरदान मैं बच्चों की कामना की तब ऋषि ने कहा जाओ  बिंदु सरोवर में स्नान करके आओ और से स्वयं भी स्नान करने चले गये और दोनों युवा रुप में हो गये उसके बाद लगातार 9 कन्याएं हुई तब देवहुति ने एक पुत्र की कामना की तब पुत्र रूप में कपिल भगवान का अवतार हुआ l

अब krdabh ऋषि पुत्र जन्म के बाद फिर से जंगल में तपस्या करने चले गए. 

Achutm keshvm राम..........


Sunday, 4 May 2025

ब्रम्हा का जन्म ( 6)

 विष्णु की नाभि के कमल पुष्प से ब्रम्हा जी का जन्म हुआ इसलिए वे स्वयंbhu कहलाये वे कमल नाल में बैठे बैठे ही तप करने लगे और तप करते हुए नीचे पहुँचने लगे उन्हें कहीं भी ठहराव नहीं मिला तब भगवान विष्णु की स्तुति करने लगे ... अच्युतm केशवm नाम naraynm, कृष्ण damodarm वासुदेवm हरे, 

श्री धरम madhvam गोपिका vllbham 

जानकी naykm रामचंद्र भजे 

विष्णु जी  पीताम्बर वस्त्र धारण कर ब्रम्हा जी को दर्शनं दिए, और विष्णु जी ने उन्हें सृष्टि करने के लिए कहा, तब ब्रम्हा जी ने snkadikon से सृष्टि करने को कहा तो उन्होंने मना कर दिया l

विष्णु के 3 रूप हुये. 

सत्य गुण....विष्णु 

रजोगुण....ब्रम्हा 

तमो गुण....महेश रुद्र रूप 

सबसे पहले अविद्या का जन्म हुआ फिर अस्मिता का अहंकार का राग द्वेष का जन्म हुआ. 

ब्रम्हा के क्रोध बढ़ने से रुद्र का जन्म हुआ रुद्र यानि शिव इनसे भी सृष्टि रचने को कहा तो शिव जी ने अजर अमर भूत पिशाच, साँप बिच्छु अनेक जीव जन्तु की सृष्टि कर डाली तब ब्रम्हा जी ने उन्हें रोका और कहा कि आप तपस्या करो तब शिव जी कैलाश पर्वत पर तपस्या करने चले गये l

अब ब्रम्हा के आधे शरीर से शतरूपा और आधे से मनु ,इनसे सृष्टि की रचना हुई 



Wednesday, 9 April 2025

भागवत कथा 5 धुंधली व dhundhkari का अन्त और संसार श्रृष्टि

 इस तरह आत्मदेव के जाने के बाद धुंध कारी ने अपनी माँ को बहुत सताया वह भी मर गयी, ऐसे में गोकर्ण भी वहाँ से चले गये. अब यह वेश्याओं के साथ रहने लगा और चोरी करने लगा उन वेश्याओं ने परेशान हो कर एक दिन उसे मार डाला, तो वह प्रेत योनि में पहुंच कर भटकता रहा व्याकुल होकर जंगलों में घूमता रहता, तब उसने गोकर्ण से अपनी मुक्ति मांगी तब गोकर्ण ने गायत्री देवी का जाप किया और सूर्यदेव का आव्हान किया तब सूर्यदेव ने भागवत सप्ताह करने को कहा और विधि बताई कि सात गांठ का एक बांस लगाव और उसमें धुंध कारी का आव्हान किया जाय फिर एक दिन में एक गांठ तोड़ी जाए इस तरह 7 गांठ टूट जाने पर उसे मुक्ति मिल जाएगी, गोकर्ण ने ऐसा ही किया इस तरह धुंध कारी मुक्त हो गया l 

सृष्टि की रचना ब्रम्हा जी ने की, पालन-पोषण विष्णु जी ने किया संहारक शिव जी हुये, ब्रम्हा जी के क्रोध से रुद्र का जन्म हुआ तब शिव जी ने पूछा कि मेरा क्या काम तो ब्रम्हा जी ने कहा कि तुम रोते हुए पैदा हुए हो इसलिए तुम रुद्र हो और काम दिया कि तुम सृष्टि की रचना करो तब शिव जी ने तमाम जीव जन्तु पैदा कर दिया वे अजर अमर हो गए तब विष्णु जी ने उन्हें रोका और कहा कि आप सृष्टि ना करें आप तपस्या करें तब शिव जी कैलाश पर्वत पर तपस्या करने चले गए l 

ब्रम्हा के आधे रूप से शतरूपा और आधे से मनु से सृष्टि शुरू हुई 

Thursday, 3 April 2025

मधुबनी पेज 3

 प्राचीन लोक चित्रों में प्रयुक्त प्राकृतिक रंगों के निर्माण की प्रक्रिया दिलचस्प होती थी l जैसे नारंगी रंग हर सिंगार के फूलों से बनाया जाता था l हर सिंगार के फूलों को पानी में उबाल कर उसमें गोंद मिला कर छान लिया जाता है, लाल रंग चुकंदर को सूखाकर,उबालकर कूट कर उसमें गोंद मिलाकर तैयार किया जाता है l पीला रंग कटहल के गूदे को उबाल कर बनाया जाता है l हल्दी में गोंद मिलाकर भी तैयार किया जाता है आजकल कपडों में करने वाले पेंट बाजार में आने लगे हैं इस नवीनता से कपडों का सौंदर्य बड़ा है वो कितने भी बार धोए जाए उनका रंग नहीं उतरता प्रेस करने के बाद वे ज्यों के त्यों नजर आते हैं यही कारण है कि आजकल भी यह लोक कला काफी लोकप्रिय हो रही है l 

Tuesday, 1 April 2025

मधुबनी पेज 2

 ये कलाकृतियां अक्सर घर की दीवारों पर तीन जगह बनाई जाती है..पूजाघर, कोहबर घर और बाहर बरामदे में. कोहबर का मतलब होता है..लोक चित्र कला से सजा ऐसा कमरा, जिसमें शादी के बाद दूल्हे और दुल्हन को सबसे पहले दिखाया जाता है और पूजा कराने के बाद कुछ खेल कराये जाते हैं l इनकी दीवारों पर बने चित्रों का विषय पौराणिक या लोककथाओं से लिया जाता है दीवारों पर बनाने के लिये इसमें गेरू का प्रयोग किया जाता है पीला रंग हल्दी से बना लेते हैं क्योंकि लाल और पीले रंग पारम्परिक रूप से पवित्र माने जाते हैं. कोहबर घर में देवी. देवताओं के चित्रों के साथ कभी-कभी दूल्हे. दुल्हन के चित्र भी बना  दी जाती है l

सूर्य.चंद्रमा बांस के पेड़ ,कमल के फूल, तोता, कछुआ मछली, स्वास्तिक, और ओम के चित्र भी पवित्रता की निशानी माने जाते हैं l भारतीय संस्कृति के अनुसार बांस का पेड़ पुरुष का, कमल का फूल स्त्री का प्रतीक माना जाता है, तोता प्रेम का, कछुआ प्रेमियों के मिलन का तथा मछली को उर्वरता का प्रतीक माना जाता है 

इस कला में विशेष योगदान के लिए मधुबनी के सित वार  पुर गाँव की श्रीमती जगदम्बा देवी को सन 1970 में भारत के राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित किया गया, तब इस कला को काफी सम्मान मिला तथा चर्चा में आई l आज महिलाओं का दृष्टिकोण बदला है उन्होंने दीवारों के अतिरिक्त अपनी पोशाकों में भी काम किया है पक्के रंगों से बनाकर बाजारों में खूब धाक जमाई है और विदेशों में भी इसकी मांग बढ़ी है, धनाढ्य वर्ग में लोग इसे बहुत पसंद कर रहे हैं सिल्क की साड़ी में इसकी चमक और बढ़ी है अभी हाल ही में दिल्ली की मुख्यमंत्री श्री रेखा गुप्ता जी मधुबनी शैली में बनी साड़ी पहने काफी चर्चा में रहीं l मूलतः बिहार निवासी दिल्ली के फैशन डिजाइनर मनीष रंजन नें भी इस शैली का प्रयोग अपने बनाये कपडों में बखूबी किया 

प्राचीन लोक चित्रों में प्रयुक्त प्राकृतिक रंगों के निर्माण की प्रक्रिया दिलचस्प होती थी 

Sunday, 30 March 2025

मधुबनी.. एक अनूठी चित्र शैली

 मधुबनी शैली की चित्रकला दुनियां में अपने तरह की एक ऐसी अनोखी चित्रकला है जिसे सिर्फ एक अंचल विशेष की महिलाएं ही परम्परागत तरीके से बनाती है ,आर्थिक एवं शैक्षिक रूप से पिछड़े विहार के इस अंचल की महिलाओं ने रंगों और आकृतियों के सहारे मानव जीवन में जिस आवेग का संचार किया, उसने न केवल इनका जीवन सरस और रंगीन बनाया, बल्कि दुनिया के नक्शे में इसकी पहचान भी बनायी l

आम तथा केले के हरे भरे पेड़ों और पानी से भरे पोखरे से घिरे अपने मिट्टी के घरों में गोबर से लिपी जमीन पर पालथी मार कर  बैठी ये महिलाएं पिछले तीन हजार बर्षों से हिन्दू देवी देवताओं के भक्ति परk चित्र बनाती आ रही हैं इन चित्रों के विषय धार्मिक ग्रंथों और पुराणों से लिए जाते हैं ,काली माँ तथा आठ भुजाओं वालीं पारम्परिक भेष. भूषण में दुर्गा जी के चित्र किसी भी कला प्रेमी के लिये आकर्षण का विषय हो सकते हैं l

इन चित्रों की प्राचीनता और उत्पत्ति के बारे मे अभी तक कोई निष्कर्ष निकाला नहीं जा सका है, पर इनका आकार प्रकार hadhppa से प्राप्त तथा पंचमार्क के सिक्कों पर बने चित्रों से मिलता जुलता है, मिथिला के कुछ प्राचीन ग्रंथों में मिले इस चित्र कला के वर्णन से निष्कर्ष पर तो पहुंचा ही जा सकता है. कि वह लोक कलाओं की एक अत्यन्त प्राचीन शैली है l मिथिला की यह एक विशेषता रही है कि इसने देश की हिन्दू संस्कृति की विशुध्दता और गरिमा को पूरी तरह से सुरक्षित रक्खा है l यह चित्रकला अपनी मौलिकता एवं पहचान को बनाये रखने में पूरी तरह से सफल रही है l मुगल कांगड़ा राजस्थानी आदि चित्रकला शैलियों का इस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा l

केवल महिलाओं द्वारा बनाये जाने वाले यह चित्र किन्हीं खास उत्सवों एवं आयोजनों के अवसर पर ही बनाये जाते हैं, इन चित्रों के लिए कोई माडल नहीं होता है ये पूरी तरह से मौलिक होते हैं इनकी तुलना कुछ मायनों में उत्तर प्रदेश के करवाचौथ एवं हरछठ पर दीवारों पर बनाये जाने वाले रेखा चित्रों से की जा सकती है l मधुबनी की कला परम्परागत रूप से माँ बेटी के माध्यम से पीढ़ी दर पीढ़ी चलती आ रही है प्रारम्भ में बेटी माँ के साथ बनवाने में मदद करती है, फिर धीरे धीरे उसका स्वरूप उसके दिमाग में अपने आप बन जाता है l विवाह के उपरान्त पति के घर जाने पर वह खूब मन लगाकर उसका अभ्यास करती है और पारंगत हो जाने पर ये कला वह अपनी बेटी को सौंप देती है यह सिलसिला जाने कब से चला आ रहा है l 

Tuesday, 25 March 2025

हरिद्वार ke आनन्द वन्य में पहली कथा (4)

 ज्ञान भक्ति और वैराग्य के मिल जाने से शांति हुई और कथा की शुरुआत. 

एक आत्मदेव नाम का व्यक्ति था बहुत ही सरल सुशील वहीँ उसकी पत्नी धुंधली कर्कश और बहुत बोलने वाली घर के काम को न करने वालीं इसलिए आत्मदेव चिंतित रहते और सोचते कि एक पुत्र ही योग्य होता तो जिन्दगी सफल हो जाता यह सोचकर घर से बाहर जंगल में निकल गया वहीँ सन्यासी रूप मैं भगवान आ गए, आत्मदेव उनके सामने रोने लगा और अपनी आत्म कथा सुनाई, तो ब्राम्हण ने कहा कि तुम्हारे सात जन्मों तक कोई संतान नहीं है अतः ये विचार त्याग कर ईश्वर के चरणों में अपना मन लगा दो, लेकिन आत्मदेव ने संतान ही मांगी, तब भगवान ने उसे एक फल दिया और कहा कि यह फल अपनी पत्नी को खिला दे और बहुत संयम से रहे. आत्मदेव बहुत खुश हुए और घर आकर अपनी पत्नी को सारी बात बताई और वही फल खाने को दिया धुंधली ने पति से हाँ कह कर सोचने लगी कि कौन 9 महीने कष्ट सहे और वह फल गाय को खिला दिया और 9 माह तक बहन के घर चली गई और उसके पुत्र को लेकर आ गई और बोल दिया कि मेरे पुत्र हुआ है और उसका नाम धुंधकारी रखा, उधर गाय को भी पुत्र हुआ उसके कान गाय की तरह थे शरीर देव की तरह तो उसका नाम गोकर्ण पड़ा l गोकर्ण सुरू से ही भक्ति में में लीन रहते और जंगल में तपस्या करने लगे इधर धुंधुकारी बड़ा ही आतताई पिता को मारता पीटता इससे परेशान हो कर आत्मदेव गोकर्ण के पास गए तब गोकर्ण ने पिता को बहुत समझाया कि आप आए भी अकेले थे जाना भी अकेले तो आप क्यों माया मोह में पड़े हैं इससे निकल कर भगवान की शरण में जाइए वहीँ कल्याण होगा, तब आत्मदेव को ज्ञान मिला और वे सब कुछ छोड़कर भागवत शरण में चले गये l


नैमिषारण्य (3 सरा पेज)

 नैमिषारण्य में सूद जी कथा सुना रहे हैं जिसमें 88 हजार ऋषि मुनियों के साथ सनक सनन्दन सहित चारों सnkadik कुमार भी हैं, यहाँ ग्यानी चिंतन करते हैं, कर्मयोगी कर्म करते हैं. भूमंडल के जिस स्थान पर भगवान ने चक्र फेंका और उसका तीर जहां पहुँचा, वही नैमिषारण्य तीर्थ है इस तपोभूमि में स्वयंbhu मनु ने एक पैर पर खड़े होकर (ओम नमो bhgvte वासुदेव) इस द्वादश अक्षर का जाप किया तब भगवान श्रीकृष्ण ने दर्शन दिया l 

तब सभी भक्तों ने गान किया..गोविंद हरे गोपाल हरे जय जय प्रभु दीन दयाल हरे 

तब मनु ने भगवान से कथा सुनाने के लिए कहा तब भगवान ने सभी 18 पुराणों मे भागवत पुराण को ही सबसे अच्छा बताया. 

उधर ग्यान और बैराग के जाग जाने से भक्ति भी प्रसन्न हो गई अब यज्ञ आदि कर्मों में रुचि रखने लगे. इस तरह ज्ञानयोग से दीनहीन व्यक्ति भी कल्याणमय हो जाता है. 

भाग 3


Wednesday, 19 March 2025

होली 2025

 इस बार की होली में हम सभी लोग दिल्ली चले गए, रेवा के न आने से हम सभी ने प्रोग्राम बना कर रेवा को सरप्राइज दिया 9 घन्टे का सफ़र कर जब हम लोग पहुंचे तो वह खुशी देखते ही बनती थी 2 दिन होली में सबने खूब इंजॉय किया सबसे ज्यादा रेवा और रावी ने खूब आनन्द किया बड़े भी खुश हुये, 2 दिन रहकर वापस आ गए l

Wednesday, 19 February 2025

भागवत पुराण 2sra दिन

 इसे पुरुषोत्तम मास किसने दिया? 

मलमास या अधिक मास को भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी शरण मे ले लिया है मलमास ने दुखी हो कर कहा था कि लोग हमे मलमास के नाम से पुकारते हैं क्योंकि हम बिना स्वामी के है तभी से उसका नाम श्री कृष्ण के नाम यानी पुरुषोत्तम मास पड़ा और कहा कि जो भी इस मास में मेरा मंगल कीर्तन करेंगे वे हमारी शरण में आ जाएंगे l

यह कथा सर्वश्रेष्ठ क्यों है? 

एक दिन नारदजी की भेंट सnkadik ऋषियों से हुईं तो वे बोले कि आप तो भगवान के अवतार है मैने सम्पूर्ण भूमंडल की यात्रा करने पर देखा कि कलयुग में सभी अधार्मिक हो गए हैं यह बात कही और दुखी हो गए मेरी भेंट एक स्त्री से हुईं वह बोली महाराज मेरा नाम भक्ति है मेरे 2 पुत्र ग्यान और बैराग हैं वे दोनो सोये हुये हैं अतः आप उन्हें जगा दीजिए तब नारदजी गीता का पाठ करने लगे तभी आकाशवाणी हुई कि नारदजी तुम सत्य कथा अर्थात भागवत कथा कहो तो नारदजी बोले यह कथा कहाँ करनी चाहिए तब ऋषि बोले कि हरिद्वार के आनन्द बन में l

तभी से आनन्द घाट पर भागवत कथा का प्रतिपादन किया गया उससे प्रसन्न होकर श्रीकृष्ण भगवान पीताम्बर पहने हुए प्राकट्य हुए नारदजी वीणा बजाने लगे सभी भक्तों ने गाना शुरू किया..

गोविंद हरे गोपाल हरे 

जय जय प्रभु दीन दयाल हरे. 

इस तरह ग्यान बैराग भी जग गए भक्ति प्रसन्न होकर मगन हो गई l


Thursday, 13 February 2025

12 फ़रवरी 1925

 4 5 वर्षीय हम दोनों का सफ़र सुख दुख को सहते निकल गया जीवन की उतरती सीढियों में सम्भालने मे अब एक दूसरे की आवश्यकता महसूस होने लगीं है तभी गुस्से को पीकर शांत रहने का हुनर भी आ गया, क्योंकि अकेले रहने वाले बहुत देखे, सब कुछ होने के बाद भी वो जगह नहीं भर्ती l उस नीरसता को कोई रस देने भी लगे तो उसे समाज मे कोई पसन्द नहीं करता ,सच कहूँ तो जीवन का यह तीसरा पहर ही सुखद होता है पैसा प्यार और नाती पोते सब कुछ मिलता है l

Tuesday, 17 December 2024

भागवत कथा

 पूजन सामग्री 

कलश स्थापना 

5pan के पत्ते, नारियल,आम पीपल का पत्ता, सुपारी, फल, जनेऊ,7 जोड़ा ,4 झंडे 2 बड़े 2 छोटे, जो, तिल, नवग्रह सामग्री, 7 दीया,बालू के 5 ढेर उस पर 5 कलश 5 दिया अब भागवत पुराण 

पूजन करने के बाद अब कथा शुरू 

भागवत क्या है? 

जिस कथा में भगवान का और उनके भक्तों का मंगलमय वर्णन हो वही भागवत है इसमे भगवान के 24 अवतारों का महत्व है!लीला पुरूषोत्तम श्री कृष्ण की लीलाओं का चरित्र दर्शाया गया है उनके सच्चिदानंद रूप का दर्शन है वे विश्व के एक मात्र कारण है, पालक,प्रलय और संहारक है जब सृष्टि नही थी तब भी भगवान थे उनका विनाश कभी नहीं होता भगवान ने संसार को खेलने और आनन्द के लिए बनाया है किन्तु कुछ लोग ज्यादा तर दुखी रहते हैं क्योंकि वे संसार को भोगते है लिप्त होते हैं, वे मकड़ी की तरह बनाते हैं जैसे मकड़ी जाला बुनती और फंसती है फिर स्वयं लील लेती है बस यहीं भगवान करते हैं 

इस कथा का स्वाद शुकदेव रुपी तोते द्वारा चखा गया है इसलिए यह बहुत मीठा है राजा परीक्षित के अनुनय विनय करने पर शुकदेव जी ने यह कथा सुनाई है वे कहते है कि सत्य प्रकृत्ति है आत्मा जीव है और परमात्मा ही नारायण है और भक्तों की कथा ही भागवत है यह कथा 18 पुराणों में अंतिम पुराण है इसमे सबसे ज्यादा रस है इसलिए यह भाग राजा है यह कथा व्यास जी ने नैमिषारण्य में लिखी थी! 

यह कथा सर्वश्रेष्ठ क्यों है  ?           (अगले अंक में) 

सेमिनार किदवई नगर में


 कल हड्डी रोग विशेषज्ञ डॉ राघवेन्द्र जैसवाल जी के सेमिनार मे चैतन्य ग्रुप को  जाने का अवसर मिला होटल मे प्रोग्राम था नास्ता भी अच्छा कराया प्रोग्राम काफ़ी अच्छा लगा हड्डी से जुड़ी समस्याओं का कारण और निवारण कैसे किया जाये जानकारी मिली 

Monday, 9 December 2024

मन की बात

 एक दिन सब कुछ ठीक हो जायेगा

 ये सोचते सोचते जिंदगी के बहुत साल गुजर गए 

 समय रेत सा  फिसल गया 

बड़ती उम्र और बदलते लोगोँ ने, 

कब फिलिंग लैस कर दिया पता ही न चला. 

खुद को दिलासा देते  देते कितनी 

ख्वाहिशें और कितनी उम्मीदें मर गई 

पता ही न चला 

इस अदभुद संसार मे बहुत ही सुंदर रंग है 

बस एक सकारात्मक ऊर्जा और प्रेम से सभी को अभिभूत हो जाना चाहिए 

फिर कोई नहीं कहेगा कि समय निकल गया 

पता ही न चला 



अक्षत पत्रिका ka संपादन

 पिताजी की पुण्य तिथि पर अक्षत पत्रिका का प्रकाशन हो गया ! पत्रिका सुन्दर आवरण के साथ आई सब लोगों को पसंद आई कुछ डाक से भी भेजी गई आवरण पर किरन चोपड़ा जी की पेंटिंग है. 

अब दिसंबर भी आ गया हल्की ठण्ड पड़ने लगी इन्हें भी बुखार के साथ यूरिन में जलन हो रही डॉ सचान को दिखाया है टेस्टिंग के बाद दवा चल रही एक हफ्ते के अंदर फिर से यूरिन टेस्ट कराना है. 


Tuesday, 22 October 2024

दशहरा और करवाचौथ २०२५

 दशहरा वाले दिन नवल के घर नातिन की मुंडन पार्टी थी अच्छा लगा दूसरे दिन जवाहरनगर गई अपोली तितली  विट्टो और रुचि पंखुड़ी अटियां संदीप सभी आये हुयेथे आज वापसी भी थी मिलकर खाया पिया व मिठाई वगैरह लेकर वापिस आ गई दीपक ईषा रावी भी आगये । जवाहर नगर आकर पुरानी यादों में यस्त हो जातीं हूँ बचपना याद आजाता है । मनसे मैं अभी भी बच्चाती हूँ लेकिन कभी कभी घर में इन लोगों की बातों से गंभीर मुद्रा में रहना पड़ता है क्योंकि और कोई हंसता ही नहीं खासकर ये शुरू सेही गंभीरता भरा दिल २ वैट अब तो यही अच्छा लगता है उम्र जब सोचती हूँ की 60+ हो चुकी हूँ तब धक्का सा लगता है वर्ना खुलके तो नाचना गाना घूमना अच्छे कपड़े पहनना 3 नौर नये नये लोगों से मिलना बहुत मन करता है और नया सीखते रहना भी '

Thursday, 10 October 2024

जाने वाले जाते है कहाँ

 बड़ी रौनक होगी आज भगवान के दरबार में

क्योंकि एक फरिस्ता पहुंचा है 

जमीं से आंसमान में ।

कितने लोग जीते हैं मरते हैं 

कुछ अपने लिये कुछ दूसरों के लिये

काश कि एक नं० होता तो बात कर लेती

कि अब फरिस्तो के साथ फरिस्ता बनकर

कौन कौनसे फूल खिला रहे और कौन सा जहाँ महका रहे ।

काश ... . .


Friday, 27 September 2024

कहानी आगे की

 भगीरथ कोयली का पति कुछ दिन रहता और उसकी कमाई का बचा हुआ पैसा लेकर चला जाता उससे वो गांव के खर्चे में काम चलाता बीड़ी पीने के अलावा और कोई ऐब नहीं था । इस तरह इनकी दो लड़किया मंजू संजू थी मंजू 14 साल की और संजू 10 साल की थी मंजू का रंग भी स्याह काला था जबकि संजू थोड़ी ठीक थी , मंजू कमसिन और युवा दिखने लगी थी उसके पीछे लड़के मंडराने लगे थे मंजू चंचल भी थी और किसी लड़के से नैन मट्टका करने लगी थी फिर क्या एक दिन वही हुआ जिसका डर था कोयली को ! मंजू भाग गई थी कहाँ गई किसके साथ गई कुछ नहीं पता कोयली परेशान सी रहती लेकिन क्या करती बस अम्मा से बतिया कर शांत हो जाती धीरे-धीरे समय बीतता गया मंजू का कुछ पता नहीं चला अब संजू भी जब समझने लगी थी उसको हम लोगों के पास ज्यादा अच्छा लगता था एक तरह से हम छः बहनों में वो भी पलने लगी . उसमें समझदारी ज्यादा आ गई थी . हम सबकी संगत का असर संजू में दिखने लगा था पूजा पाठ की करने लगी थी घर में भागवत होती तो बड़ी तन्मयता से सुनती थी फिर उसकी छोटी छोटी कथा- कहानियाँ को अम्मा को सुनाती इस माहौल मे रहते धीरे धीरे वह 18 साल की हो गई धीरे से कोयली उसको गांव ले गई और उसका विवाह कर दिया अब वह ससुराल चली नई किन्तु हम सबकी वो बहुत याद करती ऐसा कोयली बताती थी । समय बीतता गया उसके भी 5 बच्चे हो गये सबसे बड़ी लड़की 15 साल की हो गयी तो वह चूल्हा चौका संभालने लगी और लड़के पिता का हाथ बटाने लगे तब वह वापस कानपुर हमलाँगा के पास ही आगई छोटे २ बच्चो को साथ ले आई थी कोयली भी अब अस्वस्थ रहने लागी थी तो वह उसका भी सहारा बन गई और हम लोगों के साथ भी वह रहने लगी कोयली का काम अब उसने पकड़लिया था उससे उसकी आमदनी भी अच्छी हो जाती और कोठरी में मां के साथ अपने बच्चों को लेकर मजे से वह रहती कभी फसल कटने का काम हो या  शादियां करनी होतो वह गांव जाती और यहाँ से खूब सामान ले जाती सभी को यही चाहिये था । तो अब यह कोयली वाली कहानी दोहराने जैसा था फर्क बस इतना था कि हम सब की शादी हो गई अपने अपने घर चले गये तो वह अम्मा के साथ किस्सागोई करती कोयली शिथिल हो गई थी ऐसे ही एक दिन वह चिरनिद्रा में सो गई भगीरथ पहले ही मर चुका था गांव में हम लोग तो कोयली के मरने पर  घर पर नहीं परदेश में थे लेकिन बाबूजी ने उसका पूरा क्रिया कर्म विधि विधान से करवाया और संजू को ता उम्र रहने को शरण दी । आज 60 वरष की हो गई नाती पोते वाली है लेकिन रहती हमारे जन्मस्थान वाले घर जवाहर नगर कानपुर में ही है आज अम्मा भी नहीं बाबूजी भी नहीं हम सब बहने भी अपने अपने ससुराल में ,बडी दीदी भी कोरोना में नहीं रही और छोटी नौकरी कर रही देहरादून में !

 और मेरा मायका संभाल रक्खा है संजू ने हम पांचों बहनों में कोई भी घर जाते हैं तो संजू पूरा स्वागत अच्छे से करती है। साफ सफाई हो जाती चाय भी मिल जाती तो ये सब अम्मा बाबूजी का सभी पर लुटाया गया स्नेह का फल ही है। और संजू के रहते घर आवाद है। आज शोशल मीडियाके रहते कहीं भी ऐसा प्रेम देखनेको नहीं मिलता . अर्पणा पाण्डेय ९४५५२२५३२५