बाल साहित्य और बाल संस्कार
किसी भी देश की वास्तविक सम्पत्ति उसके संस्कारयुक्त बालक होते हैं | अतः बच्चों की उचित शिक्षा दीक्षा और सलीके से किया गया उनका पालन पोषण ही एक सुद्र्ण राष्ट्र के निर्माण का आधार है | बाल कल्याण और बाल संस्कारों की नींव वस्तुतः उत्कृस्ट कोटि का बाल साहित्य ही है | आज विद्यालयों में हावी उपभोक्तावादी संस्कृति के चलते तरह तरह की शिक्षाएं दी जा रहीं है ,किन्तु वह ज्ञान जो बच्चों को स्वतंत्र और उपयोगी नागरिक बनाता है ,क्या उन्हें वास्तविक अर्थों में प्राप्त हो रहा है ? बच्चों के बस्तों का बोझ आप और हम सभी देख रहे हैं | एक सात वर्ष के बच्चे के बस्ते में कम्प्यूटर तथा आधुनिक विज्ञानं की अंग्रेजी में किताबें देखकर हम चौकतें नहीं ,बल्कि खुश होते हैं | पर क्या हमने कभी सोचा है कि बच्चा इन्हे समझने में कितना समर्थ है यह वः अवस्था है जब बच्चे को कम्प्यूटर और विज्ञान की अपेक्षा नैतिकता की शिक्षा की ज्यादा जरूरत है बच्चे सब कुछ जानने के बाबजूद यह नहीं जानते हैं हैं की उन्हें अपने घर परिवार ,पड़ोस ,संबंधियों और साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए | हम अपनी व्यस्तताओं समाज अलग दिखने में अंधी दौड़ के चलते बच्चों स्वस्थ संस्कार देने के प्रति उदासीन बने रहतेहैं साथ ही अच्छा साहित्य उपलब्ध कराने के लिए कोई प्रयास नहीं करते हैं |
आज वे ही बच्चे अच्छे समझे जाते हैं जो किसी आगंतुक के आने पर एकांत में जाकर पढ़ने लगे या फिर अलग कमरे में टी.वी. देखने लगे मोबाईल या कम्प्यूटर पर गूगल में व्यस्त दिखें वे क्या देख रहे हैं उसकी तरफ कोई ध्यान नहीं पिछले दिनों करीब १० वर्षों के बाद मेरा एक परिचित के यहाँ जाना हुआ उनके बच्चे और हमारे बच्चे बराबर के थे फिर भी उनके बच्चे सामनेसमने नहीं आये आदर सत्कार खूब किया लेकिन ये उपेक्षा हम लोगों को नागवार गुजरी ,अब बच्चे १४ साल के थे उस दिन के बाद हम सबके मन से वे उतर गए क्योकि यह व्यवहार बच्चों को भी अच्छा नहीं लगा क्यूंकि अब वे समझदार हो गए थे कालोनी में ही एक सप्ताह तक हम लोग रुके रहे इस बीच वे दम्पति तो मिलने बार बार आये लेकिन अपने बच्चों से नहीं मिलवाया | और जब भी उनसे बच्चों के बारे में पूछा तो उनका एक ही जबाब रहता की बच्चे पढ़ रहे हैं और वे कहीं आना जाना नहीं पसंद करते हैं वे बड़े ही गरब से ये बात कहते की उनके बच्चों की दुनिया पढ़ाई लिखे और गूगल तक ही सिमटी हुई है आज हजारों की संख्या में बाल साहित्य की श्रेष्ठ पुस्तके प्रकाशित हो रहीं हैं ,और बाल पत्रिकाओं की संख्या भी कम नहीं हैयह साहित्य ज्ञान और मनोरंजन उन्हें दिशा निर्देश भी देगा सबसे बड़ी बात तो यह है की अच्छे साहिबच्चों की दुनिया कमरों तक सिमित कर देने में दूरदर्शन ,मोबाईल और अब तो गूगल का भी बड़ा हाथ है अधिक से अधिक चैनलों की सुविधा और बच्चों के हाथों में उसका रिमोट कंट्रोल देने में हम बड़ों का भी हाथ है जबकि इन सबके साथ अच्छी पुस्तकों का होना भी बहुत जरूरी है अच्छे साहित्य के प्रति बच्चों में रूचि जाग्रत करना हम माता पिता का ही दायित्व है वे प्रारम्भ से ही बच्चों को समाचार पत्र पढ़ने को प्रेरित करें उन्हें अच्छा साहित्य उपलब्ध करावें टीवी मोबाईल में अच्छे अच्छे प्रोग्राम देखें वे क्या देख रहे हैं उस पर ध्यान दें ,आप खेल खेल में उससे पूछते रहें की उन्हें क्या पसंद है साथ बैठकर देखने का प्रयास करें अब तो आस्क जेमिनी और चैट जी पिटी जैसे बहुत से ऍप आ गए हैं जित्य के माध्यम से बच्चों को भाषा का संस्कार मिलता है कई विद्वानों ने पुस्तकों को सबसे अच्छे मित्र की संज्ञा दी है
समाज में तेजी से बढ़ रहा हिंसाचार ,फिल्मो में विभत्स्ता ,कल्पनाओं में उड़ना अख़बारों में छाई हिंसा की खबरें बच्चों के कोमल मन को किस तरह प्रभवित करती हैं इसकी कल्पना करना ही दुरूह है इससे मुक्ति पाने के सरे रस्ते अब बंद से नजर आने लगे हैं यही नहीं विज्ञापन के जरिये अनावस्यक वस्तुओं को आकर्षित ढंग से पर्दर्सित करके बच्चों में हिन् भावना पैदा की जा रही है यह किसी जहर से कम घातक नहीं हैबच्चों को इस कुचक्र से कैसे निकला जाये ,यह हर माता पिता के लिए अहम सवाल है इसके लिए माता पिता को अधिक से अधिक समय देकर बच्चों को उसकी उपयोगिता और अनुपयोगिता के बारे में धैर्य से समझना और समझाना होगा |
बच्चों को संस्कारित करके एक सुयोग्य नागरिक बनाना हर माता पिता की नैतिक जिम्मेदारी है जिससे उसमे अतीत प्रति गर्व हो ,वर्तमान का ज्ञान हो और भविष्य के प्रति आस्था उतपन्न हो। सो अच्छे मित्र की भांति उनका मार्गदर्शन करें ,उनमे कल्पना शक्ति विकसित करें तथा मानवीय एवं उपकार की भावनाएं जाग्रत करें ,साथ ही विषम परिस्थितयों में सही निर्णय लेने की क्षमताएं पैदा करें |
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