Friday, 11 September 2026

बाल साहित्य और बाल संस्कार

  बाल साहित्य और बाल संस्कार 

किसी भी देश की वास्तविक सम्पत्ति उसके संस्कारयुक्त बालक होते हैं | अतः बच्चों की उचित शिक्षा दीक्षा और सलीके से किया गया उनका पालन पोषण ही एक सुद्र्ण राष्ट्र के निर्माण का आधार है | बाल कल्याण और बाल संस्कारों की नींव वस्तुतः उत्कृस्ट कोटि का बाल साहित्य ही है | आज विद्यालयों में हावी उपभोक्तावादी संस्कृति के चलते तरह तरह की शिक्षाएं दी जा रहीं है ,किन्तु वह ज्ञान जो बच्चों को स्वतंत्र और उपयोगी नागरिक बनाता है ,क्या उन्हें वास्तविक अर्थों में प्राप्त हो रहा है ? बच्चों के बस्तों का बोझ आप और हम सभी देख रहे हैं | एक सात वर्ष के बच्चे के बस्ते में कम्प्यूटर तथा आधुनिक विज्ञानं की अंग्रेजी में किताबें देखकर हम चौकतें नहीं ,बल्कि खुश होते हैं | पर क्या हमने कभी सोचा है कि बच्चा इन्हे समझने में कितना समर्थ है यह वः अवस्था है जब बच्चे को कम्प्यूटर और विज्ञान की अपेक्षा नैतिकता की शिक्षा की ज्यादा जरूरत है   बच्चे सब कुछ जानने के बाबजूद यह नहीं जानते हैं हैं की उन्हें अपने घर परिवार ,पड़ोस ,संबंधियों और  साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए | हम अपनी व्यस्तताओं समाज  अलग दिखने में अंधी दौड़ के चलते बच्चों  स्वस्थ संस्कार देने के प्रति उदासीन बने रहतेहैं  साथ ही अच्छा साहित्य उपलब्ध कराने के लिए कोई प्रयास नहीं करते हैं | 

आज वे ही बच्चे अच्छे समझे जाते हैं जो किसी आगंतुक के आने पर एकांत में जाकर पढ़ने लगे या फिर अलग कमरे में टी.वी. देखने लगे मोबाईल या कम्प्यूटर पर गूगल में व्यस्त दिखें वे क्या देख रहे हैं उसकी तरफ कोई ध्यान नहीं पिछले दिनों करीब १० वर्षों के बाद मेरा एक परिचित के यहाँ जाना हुआ उनके बच्चे और हमारे बच्चे बराबर के थे फिर भी उनके बच्चे सामनेसमने नहीं आये आदर सत्कार खूब किया लेकिन ये उपेक्षा हम लोगों को नागवार गुजरी ,अब बच्चे १४ साल के थे उस दिन के बाद हम सबके मन से वे उतर गए क्योकि यह व्यवहार बच्चों को भी अच्छा नहीं लगा क्यूंकि अब वे समझदार हो गए थे कालोनी में ही एक सप्ताह तक हम लोग रुके रहे इस बीच वे दम्पति तो मिलने बार बार आये लेकिन अपने बच्चों से नहीं मिलवाया | और जब भी उनसे बच्चों के बारे में पूछा तो उनका एक ही जबाब रहता की बच्चे पढ़ रहे हैं और वे कहीं आना जाना नहीं पसंद करते हैं वे बड़े ही गरब से ये बात कहते की उनके बच्चों की दुनिया पढ़ाई लिखे और गूगल तक ही सिमटी हुई है आज हजारों की संख्या में बाल साहित्य की श्रेष्ठ पुस्तके प्रकाशित हो रहीं हैं ,और बाल पत्रिकाओं की संख्या भी कम नहीं हैयह साहित्य ज्ञान और मनोरंजन उन्हें दिशा निर्देश भी देगा सबसे बड़ी बात तो यह है की अच्छे साहिबच्चों की दुनिया कमरों तक सिमित कर देने में दूरदर्शन ,मोबाईल और अब तो गूगल का भी बड़ा हाथ है अधिक से अधिक चैनलों की सुविधा और बच्चों के हाथों में उसका रिमोट कंट्रोल देने में हम बड़ों का भी हाथ है जबकि इन सबके साथ अच्छी पुस्तकों का होना भी बहुत जरूरी है अच्छे साहित्य के प्रति बच्चों में रूचि जाग्रत करना हम माता पिता का ही दायित्व है वे प्रारम्भ से ही बच्चों को समाचार पत्र पढ़ने को प्रेरित करें उन्हें अच्छा साहित्य उपलब्ध करावें टीवी मोबाईल में अच्छे अच्छे प्रोग्राम देखें वे क्या देख रहे हैं उस पर ध्यान दें ,आप खेल खेल में उससे पूछते रहें की उन्हें क्या पसंद है साथ बैठकर देखने का प्रयास करें अब तो आस्क जेमिनी और चैट जी पिटी जैसे बहुत से ऍप आ गए हैं जित्य के माध्यम से बच्चों को भाषा का संस्कार मिलता है कई विद्वानों ने पुस्तकों को सबसे अच्छे मित्र की संज्ञा दी है 

समाज में तेजी से बढ़ रहा हिंसाचार ,फिल्मो में विभत्स्ता ,कल्पनाओं में उड़ना अख़बारों में छाई हिंसा की खबरें बच्चों के कोमल मन को किस तरह प्रभवित करती हैं इसकी कल्पना करना ही दुरूह है इससे मुक्ति पाने के सरे रस्ते अब बंद से नजर आने लगे हैं यही नहीं विज्ञापन के जरिये अनावस्यक वस्तुओं को आकर्षित ढंग से पर्दर्सित करके बच्चों में हिन् भावना पैदा की जा रही है यह किसी जहर से कम घातक नहीं हैबच्चों को इस कुचक्र से कैसे निकला जाये ,यह हर माता पिता के लिए अहम सवाल है इसके लिए माता पिता को अधिक से अधिक समय देकर बच्चों को उसकी उपयोगिता और अनुपयोगिता के बारे में धैर्य से समझना और समझाना होगा | 

बच्चों को संस्कारित करके एक सुयोग्य नागरिक बनाना हर माता पिता की नैतिक जिम्मेदारी है जिससे उसमे अतीत प्रति गर्व हो ,वर्तमान का ज्ञान हो और भविष्य के प्रति आस्था उतपन्न हो। सो अच्छे मित्र की भांति उनका मार्गदर्शन करें ,उनमे कल्पना शक्ति विकसित करें तथा मानवीय एवं उपकार की भावनाएं जाग्रत करें ,साथ ही विषम परिस्थितयों में सही निर्णय लेने की क्षमताएं पैदा करें |  

Sunday, 12 July 2026

आज का दिन

आज कम्प्यूटर लग गया अच्छा लगा अब धीरे धीरे याद आने लगा 

Sunday, 15 February 2026

Svymbhu मनु.शतरूपा से सृष्टि की शुरुआत हुई.

 इनकी तीन कन्याएं हुई प्रसूति देवहुति और आहुति 

देव मतलब जिसने भगवान को बुलाया हो वह देव और मन की देखे वो देवता 

जो नर इशारे से बुलाए वो इंसान और जो कहे से  भी न करे वो नर पशु समान 

देवहुति की शादी krdabh ऋषि से हुईं एक बार krdabh ऋषि तपस्या मैं लीन थे. ओम नमो bhgvte वासुदेव. ये द्वादश अक्षर का प्रधान मंत्र है इधर नारदजी ने ऋषि को बता दिया था कि मनु और शतरूपा अपनी देवहुति का विवाह आप से करेंगे.. ऋषि सोच रहे कि ये राजकुल की कन्या कैसे रहेगी तो ऋषि ने मनु शतरूपा को बहुत समझाया लेकिन वे नहीं माने और देवहुति का विवाह ऋषि से कर के वापस ब्रम्हा वृत्त  चले गए. इधर देवहुति पति का सारा काम मन से समझ कर कर लेती थी अब ऋषि ने देवहुति की परीक्षा लेने के लिये 100 वर्षों तक के लिए समाधि लगा ली. किन्तु जब वे जागे तो तो उन्होंने देवहुति को अपने काम में पहले की तरह ही तल्लीन पाया और भेष बदल कर बोले देवी तुम कौन हो तब देवहुति ने अपना परिचय दिया. ऋषि प्रसन्न होकर बोले हम तुमसे प्रसन्न हुए कोई वरदान मांगों तब देवहुति नें वरदान मैं बच्चों की कामना की तब ऋषि ने कहा जाओ  बिंदु सरोवर में स्नान करके आओ और से स्वयं भी स्नान करने चले गये और दोनों युवा रुप में हो गये उसके बाद लगातार 9 कन्याएं हुई तब देवहुति ने एक पुत्र की कामना की तब पुत्र रूप में कपिल भगवान का अवतार हुआ l

अब krdabh ऋषि पुत्र जन्म के बाद फिर से जंगल में तपस्या करने चले गए. 

Achutm keshvm राम..........


Sunday, 4 May 2025

ब्रम्हा का जन्म ( 6)

 विष्णु की नाभि के कमल पुष्प से ब्रम्हा जी का जन्म हुआ इसलिए वे स्वयंbhu कहलाये वे कमल नाल में बैठे बैठे ही तप करने लगे और तप करते हुए नीचे पहुँचने लगे उन्हें कहीं भी ठहराव नहीं मिला तब भगवान विष्णु की स्तुति करने लगे ... अच्युतm केशवm नाम naraynm, कृष्ण damodarm वासुदेवm हरे, 

श्री धरम madhvam गोपिका vllbham 

जानकी naykm रामचंद्र भजे 

विष्णु जी  पीताम्बर वस्त्र धारण कर ब्रम्हा जी को दर्शनं दिए, और विष्णु जी ने उन्हें सृष्टि करने के लिए कहा, तब ब्रम्हा जी ने snkadikon से सृष्टि करने को कहा तो उन्होंने मना कर दिया l

विष्णु के 3 रूप हुये. 

सत्य गुण....विष्णु 

रजोगुण....ब्रम्हा 

तमो गुण....महेश रुद्र रूप 

सबसे पहले अविद्या का जन्म हुआ फिर अस्मिता का अहंकार का राग द्वेष का जन्म हुआ. 

ब्रम्हा के क्रोध बढ़ने से रुद्र का जन्म हुआ रुद्र यानि शिव इनसे भी सृष्टि रचने को कहा तो शिव जी ने अजर अमर भूत पिशाच, साँप बिच्छु अनेक जीव जन्तु की सृष्टि कर डाली तब ब्रम्हा जी ने उन्हें रोका और कहा कि आप तपस्या करो तब शिव जी कैलाश पर्वत पर तपस्या करने चले गये l

अब ब्रम्हा के आधे शरीर से शतरूपा और आधे से मनु ,इनसे सृष्टि की रचना हुई 



Wednesday, 9 April 2025

भागवत कथा 5 धुंधली व dhundhkari का अन्त और संसार श्रृष्टि

 इस तरह आत्मदेव के जाने के बाद धुंध कारी ने अपनी माँ को बहुत सताया वह भी मर गयी, ऐसे में गोकर्ण भी वहाँ से चले गये. अब यह वेश्याओं के साथ रहने लगा और चोरी करने लगा उन वेश्याओं ने परेशान हो कर एक दिन उसे मार डाला, तो वह प्रेत योनि में पहुंच कर भटकता रहा व्याकुल होकर जंगलों में घूमता रहता, तब उसने गोकर्ण से अपनी मुक्ति मांगी तब गोकर्ण ने गायत्री देवी का जाप किया और सूर्यदेव का आव्हान किया तब सूर्यदेव ने भागवत सप्ताह करने को कहा और विधि बताई कि सात गांठ का एक बांस लगाव और उसमें धुंध कारी का आव्हान किया जाय फिर एक दिन में एक गांठ तोड़ी जाए इस तरह 7 गांठ टूट जाने पर उसे मुक्ति मिल जाएगी, गोकर्ण ने ऐसा ही किया इस तरह धुंध कारी मुक्त हो गया l 

सृष्टि की रचना ब्रम्हा जी ने की, पालन-पोषण विष्णु जी ने किया संहारक शिव जी हुये, ब्रम्हा जी के क्रोध से रुद्र का जन्म हुआ तब शिव जी ने पूछा कि मेरा क्या काम तो ब्रम्हा जी ने कहा कि तुम रोते हुए पैदा हुए हो इसलिए तुम रुद्र हो और काम दिया कि तुम सृष्टि की रचना करो तब शिव जी ने तमाम जीव जन्तु पैदा कर दिया वे अजर अमर हो गए तब विष्णु जी ने उन्हें रोका और कहा कि आप सृष्टि ना करें आप तपस्या करें तब शिव जी कैलाश पर्वत पर तपस्या करने चले गए l 

ब्रम्हा के आधे रूप से शतरूपा और आधे से मनु से सृष्टि शुरू हुई 

Thursday, 3 April 2025

मधुबनी पेज 3

 प्राचीन लोक चित्रों में प्रयुक्त प्राकृतिक रंगों के निर्माण की प्रक्रिया दिलचस्प होती थी l जैसे नारंगी रंग हर सिंगार के फूलों से बनाया जाता था l हर सिंगार के फूलों को पानी में उबाल कर उसमें गोंद मिला कर छान लिया जाता है, लाल रंग चुकंदर को सूखाकर,उबालकर कूट कर उसमें गोंद मिलाकर तैयार किया जाता है l पीला रंग कटहल के गूदे को उबाल कर बनाया जाता है l हल्दी में गोंद मिलाकर भी तैयार किया जाता है आजकल कपडों में करने वाले पेंट बाजार में आने लगे हैं इस नवीनता से कपडों का सौंदर्य बड़ा है वो कितने भी बार धोए जाए उनका रंग नहीं उतरता प्रेस करने के बाद वे ज्यों के त्यों नजर आते हैं यही कारण है कि आजकल भी यह लोक कला काफी लोकप्रिय हो रही है l 

Tuesday, 1 April 2025

मधुबनी पेज 2

 ये कलाकृतियां अक्सर घर की दीवारों पर तीन जगह बनाई जाती है..पूजाघर, कोहबर घर और बाहर बरामदे में. कोहबर का मतलब होता है..लोक चित्र कला से सजा ऐसा कमरा, जिसमें शादी के बाद दूल्हे और दुल्हन को सबसे पहले दिखाया जाता है और पूजा कराने के बाद कुछ खेल कराये जाते हैं l इनकी दीवारों पर बने चित्रों का विषय पौराणिक या लोककथाओं से लिया जाता है दीवारों पर बनाने के लिये इसमें गेरू का प्रयोग किया जाता है पीला रंग हल्दी से बना लेते हैं क्योंकि लाल और पीले रंग पारम्परिक रूप से पवित्र माने जाते हैं. कोहबर घर में देवी. देवताओं के चित्रों के साथ कभी-कभी दूल्हे. दुल्हन के चित्र भी बना  दी जाती है l

सूर्य.चंद्रमा बांस के पेड़ ,कमल के फूल, तोता, कछुआ मछली, स्वास्तिक, और ओम के चित्र भी पवित्रता की निशानी माने जाते हैं l भारतीय संस्कृति के अनुसार बांस का पेड़ पुरुष का, कमल का फूल स्त्री का प्रतीक माना जाता है, तोता प्रेम का, कछुआ प्रेमियों के मिलन का तथा मछली को उर्वरता का प्रतीक माना जाता है 

इस कला में विशेष योगदान के लिए मधुबनी के सित वार  पुर गाँव की श्रीमती जगदम्बा देवी को सन 1970 में भारत के राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित किया गया, तब इस कला को काफी सम्मान मिला तथा चर्चा में आई l आज महिलाओं का दृष्टिकोण बदला है उन्होंने दीवारों के अतिरिक्त अपनी पोशाकों में भी काम किया है पक्के रंगों से बनाकर बाजारों में खूब धाक जमाई है और विदेशों में भी इसकी मांग बढ़ी है, धनाढ्य वर्ग में लोग इसे बहुत पसंद कर रहे हैं सिल्क की साड़ी में इसकी चमक और बढ़ी है अभी हाल ही में दिल्ली की मुख्यमंत्री श्री रेखा गुप्ता जी मधुबनी शैली में बनी साड़ी पहने काफी चर्चा में रहीं l मूलतः बिहार निवासी दिल्ली के फैशन डिजाइनर मनीष रंजन नें भी इस शैली का प्रयोग अपने बनाये कपडों में बखूबी किया 

प्राचीन लोक चित्रों में प्रयुक्त प्राकृतिक रंगों के निर्माण की प्रक्रिया दिलचस्प होती थी