Wednesday, 19 November 2014

बच्चों की असीमित क्षमताओं को पहचाने और उन्हें संवारें।                                                                      बच्चों में असीम क्षमता है उस क्षमता को सर्व-प्रथम माँ-पिता को पहचानना बहुत जरूरी है.फिर  उसे संवारने की आवस्यकता होती है क्योंकि आजकल दुनिया में गरीबी ,नाइंसाफी ,और हिंसा इस कदर हांबी है कि बच्चों को सम्भालना   और उससे बचाना हर माँ-बाप के लिए दुस्कर होता जा रहा है ,अतः इसकी कामयाबी के लिए माँ-बाप को अपने बच्चे पर पूरा ध्यान देना आवस्यक है उसकी रूचि किस काम में ज्यादा है यह जानने के लिए उसे उसके टीचर से भी कंसर्ट करना चाहिए और जहां कमी हो उसे तुरंत दूर करने का प्रयास करना चाहिए ,शहरों में तो अभिभावक सजग होते है अभी ग्रामीण क्षेत्रों में सजगता की कमी है 
बच्चे देश के भावी कर्णधार हैं ,बच्चों का वर्तमान के साथ -साथ उसका भावी जीवन भी बहुत महत्व रखता है। उसे अपने को हर स्थित में मजबूत रखना है सुदृढ़ रखना है ऐसी स्थिति में माँ बाप को काफी सजग रहना   होगा। हमारे देश में जो उंच-नीच की खाई है वो काफी गहरी है गरीब माँ-बाप चाह  कर भी अपने होशियार बालकों को अच्छे स्कुल में नहीं पढ़ा सकते ,यदि अपनी भूख  को मार कर किसी तरह बच्चे को अच्छे स्कुल के टेस्ट में पास होने पर एडमिशन दिला  भी दिया तो प्रिन्सपल का पहला शब्द ये होता है की आप उसका होमवर्क देख सकेंगे या उसके लिए कोई ट्यूशन की आव्सय्कता पड़ी तो उसका खर्च वहन  कर सकेंगे ,ऐसा हर स्कुल में नहीं होगा ,लेकिन इन समस्याओं से 25 वर्ष पहले मै रूबरू हुई हूँ ,इसलिए मेरे व मेरे बेटे के जेहन में ये बाते कहीं न कहीं कभी न कभी चोट देकर आहत तो करती ही हैं। अच्छा इसके बाद आता है ,स्कूल जाया कैसे जाये फीस और ड्रेस के खर्चे में तो कटौती की नहीं जा सकती  यही खर्चा, पैदल या सवारी वाले सरकारी वाहनो से जाकर कम पैसे में काम चल सकता है उसके लिए घर के सभी सदस्यों को समय से पहले तैयार होना रहता है जब इन हालातों में बच्चा स्कुल में पढ़ता है तो कहीं न कहीं उसके मन में हींन भवना बैठने लगती है ऐसे समय में क्या किया जाए क्या उस स्कुल में बच्चों को पढ़ाया न जाये ? ये समस्या हर मध्यम परिवार के लोगों  की है जिनके बच्चे एक अच्छे नामी -गिरामी स्कूल में पढ़ना चाहते हैं लेकिन मन मार कर किसी साधरण स्कूल में दाखिला ले लेते है वे बच्चे ऊँची शिक्षा नहीं पाते ऐसा नहीं है किन्तु उनके मन में मलाल रह जाता है की मै वहां नही पढ़ पाया तो ऐसी हीन - भवनाओं को बच्चे के मन में नहीं आने देना चाहिए वैसे अब बच्चों के अंदर भी बड़ा बदलाव आया है आज इंटर नेट के जरिये वे सहजरूप से बढ़ा से बड़ा ज्ञान अर्जित करले रहें है ,अभी हांल ही में हमारे u.p के मुख्यमंत्री श्री अखिलेश यादव जी ने गरीबों के बच्चों को लैप -टॉप बांटकर उन्हें उनके हौसलों की उडान भरने की कोशिश की है 
बच्चों के लिए परिवार में एक व्यवहारिक सच होना चाहिए संवेदनशीलता होनी चाहिए और उन्हें कठिनाइयों से लड़ने की क्षमता हंसी- ख़ुशी से निकाल देने की होनी चाहिए ये सब गुण आप में होंगे तो बच्चा भी उसी का अनुकरण करेगा बच्चे सहजता से इसे अपने में आत्मसात कर ही लेंगे ,और उन्हें अपने परिवार के लिए एक जिम्मेदार सदस्य होने का अहसास होगा। 
 यह बात तो आज सही है की अभिभावक आज के समय में बच्चों को उतना समय नहीं दे पाते है और बच्चों से अपेक्षाएं बहुत रखने लगे है ऐसे में बच्चे टेलीविजन  व इंटरनेट का सहारा लेते है भौतिकता की चकाचौंध में बच्चों की रुचियाँ भी बदल रहीं है तो हमारा आप का कर्तव्य है की प्यार से बच्चों को हमझायें कि क्या   उचित है क्या नहीं फिर आप उनसे अच्छे बनने की अपेक्षा करें ,
आज हमारे प्रधान मंत्री जी भी अच्छे हुनर को आगे बढ़ाने के विभिन्न प्रयास कर रहे है वे कहते है की बचपन से ही बच्चे की जिस काम को करने की रूचि हो उसके लिए उसे वैसे  ही स्कूल में दाखिला मिले जिससे वह उस कार्य में मन लगाकर काम करेगा।और अपने किये गए काम में सफलता अर्जित करेगा। तो आज हर माता पिता को अपने बच्चे के हुनर को पहचानने और उसे उसको पंख देने की आवश्य्कता है उसकी क्षमताओं को पहचाने और ऊँची उड़ान भरने के काबिल बनाएं।                                                                                  
अर्पणा पाण्डेय। 
09455225325

Thursday, 6 November 2014

कार्तिक-पूर्णिमा पर तुलसीबंदन-- तुलसा महारानी नमो-नमो हरि की पटरानी नमो-नमो -- कहाँ बिराजें तुलसा , कहाँ बिराजें रामा ,और कहाँ बिराजें रे मोरे सालीग्रामा माटी बिराजे तुलसा ,मंदिर बिराजे रामा ,और सिहंघासन बिराजे मोरे सालीग्रामा क्या ओढ़े तुलसा , क्या ओढ़े रामा, और क्या ओढ़े रे मोरे,सालीग्रामा साल ओढ़े तुलसा , दुशाला ओढ़े रामा ,काली-कमली (कम्बल )के उढ़ैय्या मोरे सालीग्रामा... तुलसा महारानी नमो-नमो हरि की पटरानी नमो-नमो। क्या खाएं तुलसा ,क्या खाएं रामा ,क्या खाएं रे मोरे सालीग्रामा ,लाडू खाएं तुलसा ,पेड़ा खाएं रामा ,दूध के पिलैया मोरे सलीग्रामा। तुलसा महारानी नमो-नमो ....... (अर्पणा) bachpan se apni maa ke sath har saal kartik maah me tulsi ki puja kar gati aa rahi hun ,is bar akele hi...aap logon ke sath gati hun.

Monday, 3 November 2014

बच्चों की असीमित क्षमताओं को पहचाने और उन्हें संवारें।                                                                      बच्चों में असीम क्षमता है उस क्षमता को सर्व-प्रथम माँ-पिता को पहचानना बहुत जरूरी है.फिर  उसे संवारने की आवस्यकता होती है क्योंकि आजकल दुनिया में गरीबी ,नाइंसाफी ,और हिंसा इस कदर हांबी है कि बच्चों को सम्भालना   और उससे बचाना हर माँ-बाप के लिए दुस्कर होता जा रहा है ,अतः इसकी कामयाबी के लिए माँ-बाप को अपने बच्चे पर पूरा ध्यान देना आवस्यक है उसकी रूचि किस काम में ज्यादा है यह जानने के लिए उसे उसके टीचर से भी कंसर्ट करना चाहिए और जहां कमी हो उसे तुरंत दूर करने का प्रयास करना चाहिए ,शहरों में तो अभिभावक सजग होते है अभी ग्रामीण क्षेत्रों में सजगता की कमी है आगे। .......                                                           

Wednesday, 17 September 2014

गाय की रक्षा में --- राजा दिलीप ने गाय की खातिर अपना सर्वस्व भेंट चढ़ाया था। गोरक्षा सीट गुरु-गोविन्द सिंह ने सुत  की बलि चढ़ाई थी.,  सिक्खों के इतिहास को देखो मन की तज कुटलाई रे ,महाराज रंजीत सिंह ने गोबध दिया हटाया था। ब्रिटिश राज्य में काशी भीतर एक हरिश्चंद्र उपजाया था। सबसे पहले गो-गुण पुस्तक  उसने ही बनवाई थी। नागपुर के चीफ-कमिश्नर ने देखो क्या बतलाया था ? गो-हित भूमि- दान जो देवे,उस पर कर ना लगवाई रे। गवरमिंट पंजाब ने गो-हिट सर्कुलर छपवाया था -आम-तौर पर बूचड़ खाने दीजो सब उठवाई रे। वाइसराय जब बम्बई आये आज्ञा ये फ़रमाई रे -भारत-माता समझो  गो को ,लेक्चर में दर्शाया  था ,---आगे

Tuesday, 16 September 2014

जान  हिंदी है ! तो हिंदुस्तान मेरा अंग है                                                                                                           गर्भ से ही हिन्द बच्चों के ये रहती संग है ,                                                                                                       देश-भाषा ही के बल पर आज ये मजबूत है ,                                                                                                   धन-व बल जातीयता में सब तरह भरपूर है ,                                                                                                 कौन है जो देश भाषा का नहीं रखता गुमान।                                                                                                  रूस ,अमरीका व यूरोप चीन है या जापान।                                                                                                     देश-भाषा ही के बल पर आज वे मशहूर हुए।                                                                                                 धन व बल जातीयता में सब तरह भरपूर हैं।                                                                                                   राह सीधी  छोड़ कर उलटे जो हम चलने लगे।                                                                                                हो गया उल्टा बिधाता काम सब उलटे हुए।                                                                                                     हम- सबको काँटों सी चुभे हिंदी गरीब   क्यों न हो हों फिर जमाने में सबों से बद नसीब                                                                          

bhart varsh hmara hai

हमें अपना देश भारत ,प्राणो से भी प्यारा है। हम हैं भारत के भारत-वर्ष हमारा है।                                            बिताया खेल ऋषियों ने लड़कपन गोद  में जिसके।पुराना जगमगाता  भारत हमें प्राणों से भी प्यारा है।              सुघड़ रन बाँकुरे ,कवि-लेखकों की खानि है जिसमे। अखिल अनमोल रत्नो का वो सुख-सागर हमारा है।           हम है कुर्बान उसके जंगलों और टीलो पर। ये जीवन  हम कर दें निछावर ,मनमोहनी झीलों पर।             जमीं गद्दा हमारा है मुलायम बिंध्य तकिया है। हिमालय है सिपाही तो सिंध भी सेवक हमारा है।                 दुखी है उसके दुःख में तो ,सुखी है उसके सुख मे भी , हम है संतान उसकी तो वह रक्षक पिता  हमारा है.           न छोडूंगी ना छोड़ूगा फटे  इस तेरे दामन को , कहूँगी मरते दम  तक कि ये भारत-वर्ष हमारा है   ०        अर्पणा पाण्डेय। 9455225325                             

Saturday, 6 September 2014

 बच्चों में ज्ञानेन्द्रिय विकास हेतु नृत्य,संगीत ,और नाट्य-कला का ज्ञान होना बहुत जरूरी ==                           बच्चे निरंतर कुछ न कुछ सीखते रहते हैं. किसी भी वस्तु को  देखकर छूकर और कानो से सुनकर अपनी प्रतिक्रिया देते रहते हैं कभी-कभी सूंघकर और चखकर भी वे सवाल-जबाब करते हैं एकांत में वे कभी सोचते-विचारते  भी नजर आ जाते हैं ऐसे में उन्हें देखना भी अति आवस्यक हो जाता है ,  वे विचार करते हैं और दूसरों तक अपनी बात पहुँचाना भी सीखते हैं और अपने भावों पर नियंत्रण करना भी सीख जाते हैं जब बच्चा बोल नहीं पाता  है तब जब  उससे बात करते हैं तो वह आँ ,ऊं व अपने चेहरे के भावों को प्रकट करता है जैसे वह आपकी हर बात का जबाब देता हो ,हाथ-पैर चलाकर हंस कर। रो कर खूब बातें करता है जिन्हे  सबसे निकटम व्यक्ति  माँ सब समझ लेती है। निःसंदेह नारी में यह क्षमता तो प्रकृति-प्रदत्त है वह बालमन चिंतन भावना संवेदना और आकांक्षा की सबसे बड़ी अध्ह्येता है। इन्ही क्रियाशील ज्ञानेन्द्रिय के विकास के लिए माता-पिता को सदैव तत्पर रहना चाहिए।                                                                                                                                                     बच्चे अपनी शारीरिक गतिविधियों से यानि नृत्य और अभिनय द्वारा ,अपनी आवाज के माघ्यम से संगीत का ज्ञान प्राप्त करके अपनी ज्ञानेन्द्रिय का विकास आसानी से कर सकते हैं बस उन्हें थोड़ी सहायता और नियमित अभ्यास की आव्सय्कता होती है। यही कार्य  आदत बन जाने पर आसान हो जायेगा और उन्हें इस क्रिया में आनंद आएगा इस प्रकार उनके शारीरिक और मानसिक कार्य में बृद्धि होगी।  जब बच्चे ३,४ वर्ष के हो तो उन्हें स्वाद,गंध और स्पर्श के माध्यम से वस्तुएं पहचानने को दे ,जैसे पुराने कपड़ों के छोटे-छोटे थैले सील ले अब किसी में प्याज,किसी में आलू,सुखी धनिया ,मसले ,रबर,चाक ,व अन्य पदार्थ डालकर बच्चों की आँखों में पट्टियां बांध दे फिर उन्हें गंध पहचाने को कहे आप देखेंगे की बच्चे कितनी रूचि से खेल-खेल में सूंघने की क्रिया का ज्ञान प्राप्त कर रहे हैं।  इसी प्रकार चखकर पहचानो उन्हें मीठा,खट्टा,  कड़ुआ ,फीका आदि सामान दे उनकी आँखों में पट्टी बांधकर चखाएं फिर पूछे कि स्वाद कैसा है। बालक से यह भी पूछे की कि उसने कैसे पहचाना ? इस तरह स्वाद की विशेसता बताकर उन्हें प्रोत्साहित करें।  इसी प्रकार किसी वास्तु को श्पर्श द्वारा यानि वास्तु को छूकर उसे पहचानने के लिए प्रोत्साहित करें ,इसके लिए कुछ कुदरती बस्तुये जैसे बीज,कंकड़,बालू मिटटी,कपड़ा , शीप , मोती आदि अन्य पदार्थ हो सकते है इन वस्तुओं को एक थैले में डालकर बच्चो का हाथ उसमे डलवाकर ,बिना देखे पूछे की वह कौन सी वस्तु है ,व वह कैसा है खुरदरा है या चिकना हैं। सख्त है या मुलायम है ? भरी है कि हल्का है ? थोड़े  बड़े बच्चों से आप पूछ सकते है कि वह कैसा व किस काम आता है ? इस प्रकार सही जानकारी देकर आप उनका ज्ञानेन्द्रिय विकास सहजता से कर सकते हैं। अब बच्चों से गतिमय कार्य कराएं जैसे कोई कविता सुना कर हाथों और भावों से गति करेंएवं बच्चों को आपस में हाथ पकड़कर घूमने को कहें,शब्दों के हिसाब से वे एक्शन करें,खेल को मनोरंजक बनाने के लिए कोई ब्ब्जाने वाली चीज लेकर गाने व कविता  के साथ बजाकर उन्हें खिलाये। इसी प्रकार नाटक या अभिनय द्वारा ,बच्चो को रेलगाड़ी के आकर बनवाकर छुक -छुक की आवाज निकालकर घुमायें. इस तरह उनमे स्वयं ही अनुभव ,कल्पना और अभ्व्यक्ति का सामंजस्य स्थापित होगा। ताल,गति और ध्वनि के माध्यम से नृत्य,गीत और नाट्य तीनो कलाओं का ज्ञान होगा नाटकीय खेलो में छोटे बच्चों को गुड़िया गुड्डे की शादी ,घर बनाना ,डाक्टर-मरीज का खेल ,कुर्सी दौड ,इन  खेलों से बच्चो का मनोरंजन भी होगा। और साथ ही शारीरिक विकास के साथ ज्ञानेन्द्रिय विकास मजबूत होगा।   (अर्पणा पाण्डेय )